Thursday, 27 February 2014

सर्वे में एनडीए की बल्‍ले-बल्‍ले, यूपीए को तगड़ा झटका




2014 के आम चुनाव में यूपीए को तगड़ा झटका लग सकता है, जबकि एनडीए का प्रदर्शन शानदार रहने का अनुमान है। टाइम्स नाउ सी वोटर के सर्वे के नतीजों से ये बातें सामने आई हैं। हालांकि सरकार बनाने के लिए मोदी को जूझना पड़ सकता है, क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियां उनकी राह का रोड़ा साबित हो सकती हैं।
लोकसभा चुनाव को लेकर टाइम्स नाउ, सी वोटर सर्वे के जो नतीजे आए हैं, उससे यूपीए को बड़ा झटका लग सकता है, जबकि एनडीए राहत की सांस ले सकता हैं। हालांकि क्षेत्रीय पार्टियां मोदी की राह का रोड़ा साबित हो सकती हैं। सर्वे के मुताबिक, यूपीए के महज 101 सीट पर ही सिमटने का अनुमान है, जबकि एनडीए का आंकड़ा 227 सीटों तक पहुंच सकता है। वहीं अन्य के खाते में 215 सीटें जाती नजर आ रही हैं। यानि साफ है कि मोदी का रथ आगे तो बढ़ रहा है, लेकिन क्षेत्रीय पार्टियां उसे रोकने के लिए पूरा जोर लगाती नजर आ रही हैं। खास बात ये है कि राहुल की मेहनत का कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा।
सर्वे के मुताबिक, कांग्रेस को महज 89 सीट मिलने का अनुमान है, जो कि उसकी अब तक की सबसे कम सीट होगी, जबकि बीजेपी को अपने दम पर 202 सीट मिल सकती है। यानि मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में जीती गई सीटों का रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं।
बावजूद इसके बीजेपी का मिशन 272+ कामयाब होता नजर नहीं आ रहा। हिंदी भाषी प्रदेशों में जहां बीजेपी को अच्छी कामयाबी मिलने की उम्मीद है। वहीं दक्षिण से बहुत ज्यादा आस नहीं है। तमिलनाडु में जयललिता का जोर नजर आ रहा है तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का। आम आदमी पार्टी भले ही ताल ठोक रही हो, लेकिन उसके लिए सर्वे में ज्यादा संभावनाएं उभरकर सामने नहीं आई हैं।
कुल मिलाकर टाइम्स नाउ सी वोटर के सर्वे से बीजेपी के लिए खुश होने की बात जरूर है, लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे क्षेत्रीय दलों को साथ लाने की जरूरत पड़ेगी।
2014 लोकसभा चुनाव से पहले टाइम्स नाउ-सी वोटर के सर्वे से बीजेपी खासी उत्साहित है, वहीं बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने मिशन 2014 के लिये पूरी ताकत झोंक दी है। इसी कड़ी में मोदी आज सुबह करीब 9 बजे मुंबई में नासकॉम इंडिया लीडरशिप फोरम में हिस्सा लेंगे। हाईटेक तरीके से मिशन 2014 में जुटे मोदी नेशनल एसोसिएशन ऑफ साफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज यानी नासकॉम के सम्मेलन को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये अहमदाबाद से संबोधित करेंगे। इस दौरान मोदी, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और सॉफ्टेवयर सेवा कंपनियों के प्रतिनिधियों से मुखातिब होंगे।

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Friday, 14 February 2014

जनलोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो भी इस्तीफा नहीं देंगे केजरीवाल


नई दिल्ली। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है, "जन लोकपाल बिल के लिये अगर मुख्यमंत्री की 100 कुर्सियां भी कुरबान करनी पड़े तो मैं तैयार हूं"। सीएम साहब के इन शब्दों के बाद अगर आप यह सोच रहे हैं कि अगर आज दिल्ली विधानसभा में जनलोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो केजरीवाल कुर्सी छोड़ देंगे और दिल्ली को फिर से चुनाव का मुंह देखना पड़ेगा तो हम आपकी गलतफहमी दूर कर देते हैं। असल में बिल पास नहीं हुआ तो केजरीवाल आज इस्तीफा नहीं देंगे। आम आदमी पार्टी के सूत्र की मानें तो केजरीवाल पहले तो सदन में पूरी कोशिश करेंगे कि बिल पास हो जाये। बिल सिर्फ उसी सूरत में नहीं पास होगा, अगर कांग्रेस पार्टी के विधायकों ने वॉकआउट किया, क्योंकि केजरीवाल को भरोसा है कि उनके बिल को पर्याप्त वोट मिल जायेंगे। अगर पर‍िस्थितियां उलट गईं, तो केजरीवाल इस्तीफा देने के बजाये, कल यानी शुक्रवार को ही दिल्ली की जनता से एक बार फिर सवाल करेंगे, "क्या मैं दिल्ली के सीएम पद से इस्तीफा दे दूं?" यह सवाल ठीक उसी तरह जनता तक पहुंचाया जायेगा, जिस तरक सरकार बनाने के लिये पूछा गया था। इंटरनेट, मोबाइल एसएमएस और जनता के बीच जाकर वोट कराये जायेंगे। इस जनमत संग्रह के लिये आप के वॉलेंटियर्स तैयार बैठे हैं, उनका फॉरमैट पूरी तरह तैयार है, जरूरत है तो बस केजरीवाल के इशारे की। हां इन सबके बाद अगर जनता का जवाब हां में होता है, तभी केजरीवाल इस्तीफा देंगे, अन्यथा नहीं। क्यों फंस गया है जनलोकपाल बिल जनलोकपाल बिल, स्वराज बिल, बिजली की सबसिडी संबंध‍ित बिल, आदि के लिए विधानसभा का विशेष चल रहा है, जो 16 फरवरी तक जारी रहेगा। मुख्यमंत्री ने पहले घोषणा की थी कि जनलोकपाल बिल 16 तारीख को विधानसभा के बजाय इंदिरा गांधी स्टेडियम में पेश किया जाएगा। लेकिन अब ऐसा होता नहीं दिखाई दे रहा है। क्योंकि सदन की कार्यवाही ही सुचारु रूप से नहीं चल पा रही है। सदन की कार्यवाही में सबसे बड़ा रोढ़ा केजरीवाल के मंत्री सोमनाथ भारती हैं, जिनके ख‍िलाफ विरोध लगातार जारी है। यह विरोध आप की सहयोगी पार्टी कांग्रेस भी कर रही है। उधर भारतीय जनता पार्टी के विधायकों का कहना है कि अभी तक उन्हें बिल की कॉपी भी नहीं दी गई है। दूसरी ओर केंद्रीय कानून मंत्रालय केंद्रीय कानून मंत्रालय से इस बिल के बारे में राय आने के बाद इसे पेश होने से रोकने के लिए उपराज्यपाल नजीब जंग विधानसभा अध्यक्ष को संदेश भेज चुके हैं। बताया जा रहा है कि बिल के हिंदी अनुवाद की प्रति तैयार नहीं है, लिहाजा उसे एजंडे पर नहीं रखा जा सकता है


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Wednesday, 5 February 2014

हरीश रावत जी आपको अपनी करनी और कथनी से खुद को साबित करना होगा

   प्रतिष्ठा में,
       
श्रीयुत हरीश जी रावत
       
 माननीय मुख्यमंत्री,
       
 उत्तराखंड शासन, देहरादून। आदरेय,
  श्री रावत जी सादर नमस्कार।

उत्तराखंड राज्य में मुख्यमंत्री मनोनीत होने पर आपको बधाई। यद्यपि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में यहां पर बधाई देना इसलिये उचित प्रतीत नहीं हो रहा है कि प्राकृतिक आपदा की मार और स्थापना के तेरह वर्षों में कुनीति और अदूरदर्शिता से राजनीतिज्ञों और नौकरशाही के हाथों लुट-पिट चुके इस राज्य में बधाई और उत्सव जैसे शब्द बेईमानी साबित होते हैं। चूंकि वर्ष 2002 के चुनावों से आज तक आपकी अभीप्सा भी थी और सही मायने में आपका हक भी था अतः आपको अब मिले ऐसे सुयोग की व्यक्तिशः बधाई।

 जैसा कि आप विज्ञ हैं और मेरी स्मृति के अनुसार मैं नब्बे के दशक से आपके राजनैतिक जनसंघर्षों का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं। उत्तराखंड को एक आदर्श पर्वतीय राज्य के रूप में देखने की टीस का मैं भी हम विचारक हूं, परन्तु राज्य स्थापना के तेरह वर्षों में निराशा का जो कुहासा छाया है उसमें आशा की किरण टटोलना एक दुष्कर कार्य है। परन्तु अपने लंबे और गहन राजनैतिक अनुभवों के बाद आपने चुनौती स्वीकार की है तो इसे राज्य के सुखद भविष्य के रूप में देखना इस राज्य की आशावादिता को मजबूत करता है।
   
यद्यपि यह सब मैं आपके समकक्ष पूर्व महानुभावों को भी लिखना चाहता था, परन्तु लिखने के अवसर इसलिये प्रासंगिक नहीं लगे कि उनमें से तो कुछ तो इतने अनुभवजन्य थे कि उन्हें लिखना उचित प्रतीत नहीं हुआ और बाकी ऐसे थे कि उनके लिए लिखना या न लिखना कोई मायने नहीं रखता।
 
मुझे  याद पड़ता है कि आपकी और मेरी व्यक्तिगत चर्चाओं में आपने कई बार अपनी विपन्न पारिवारिक प्रष्ठभूमि का जो जिक्र किया था वह आज भी मेरा आदर्श है कदाचित इन्ही परिस्थितियों ने आपके संघर्ष को संबल प्रदान किया और मेरी नजर में आपने आशातीत सफलतायें अर्जित की हैं। वस्तुतः उत्तराखंड का वास्तविक आम आदमी (राजनैतिक शब्दावली का आम आदमी नहीं) आज भी विपन्नताओं से जूझ रहा है। इस राज्य के आकाओं ने अंधा बांटे रेवड़ी की तर्ज पर अपने-अपनों की पीढ़ियों का भला कर लिया है परन्तु इस राज्य का आम जन खुद को ठगा-ठगा महसूस कर रहा है। आपने उत्तराखंड को पृथक राज्य की बजाय हिल काउंसिल और केन्द्र शासित राज्य की पुरजोर वकालत की थी काश। ऐसा हुआ होता तो राज्य के भीतर नवधनाढ्य राजनीतिज्ञों की इतनी बड़ी फौज नहीं होती।
   
आपने सत्ता संभाली है तो निश्चित रूप से पतझड़ के बाद बसन्त ऋतु के आगमन बेला में। सच्चाई भी है कि इस राज्य में पतझड़ की वीरानगी जैसी वास्तविक स्थितियां बनी हैं आपकी ताजपोशी उत्तराखंड के लिये वसन्त ऋतु जैसी खुशहाली का सुखद अहसास करा सके ऐसी मेरी अपेक्षा भी है और परमपिता से प्राथना भी।
   
राज्य की दशा और दिशा को सुधारने के लिये मेरा विनम्र आग्रह है कि आपको खुद की करनी और कथनी से हिमांचल का वाई.एस. परमार साबित करना होगा वस्तुतः दुर्भाग्य है कि उत्तराखंड को आज तक परमार नहीं मिल सका। चलो, जब जागो तब सवेरा, हम इसे ही उत्तराखंड राज्य की प्रभात बेला मान लें यहीं से नयी नज़ीर शुरू की जा सकती है परन्तु इस सबके लिये क्षेत्र, जाति, वर्ग और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कड़े व ठोस निर्णय लिये जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। मेरी नजर में राज्य के दीर्घकालिक संपोषित विकास हेतु कतिपय मुख्य बिन्दु निम्नवत हैं-
० राज्य द्वारा संचालित कार्यक्रमों और विकास योजनाओं का ईमानदारी पूर्वक नियमित अनुश्रवण, जो आज तक संभव नहीं हो सका है।
० निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की गतिशीलता को बढ़ाकर राज्यव्यापी किया जाना, प्रायः देखा गया है कि राज्य के मंत्री और दायित्वधारी अपने निर्वाचन क्षेत्र से दून तक ही सीमित हो जा रहे हैं।
० मितव्ययिता, स्वागत समारोहों से दूरी, लाव लश्कर में कमी जनआकांक्षाओं को पूरा भी करेगी और राज्य की समृद्धि भी होगी।
० पर्वतीय राज्य की पर्वतीय और भौगोलिक केन्द्र की स्थाई राजधानी।
० जल, जंगल, जमीन इस राज्य के मुख्य संसाधन आंके जरूर गये हैं परन्तु दुर्भाग्य है कि निवेश-विनिवेश के लिये इनकी एक बाजारू वस्तु के रूप में सौदेबाजी की गयी है, जबकि जन-जंगल-जमीन के साथ जन और जानवर का विनियोग कर राज्य में पांच ‘ज’ आधारित दीर्घकालिक प्रबन्धन की दरकार है।
० राज्यके बड़े बजट से संचालित सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा कार्यक्रम जनता का विश्वास खो चुके हैं और उत्तराखंड शिक्षा व स्वास्थ्य माफिया की भेंट चढ़ रही है और जो राशि स्थाई विकास में खर्च होनी चाहिये थी वह सफेद हाथी बन चुके शिक्षा संस्थानों और चिकित्सालयों के अवसंरचनात्मक विकास और संबन्धितों के ऊंचे वेतन और भत्तों में अनावश्यक रूप से खर्च हो रही है।
० सत्ता, नौकरशाही और जनता के बीच आत्मीयता का कोई तारतम्य नहीं है जो कि जनाधारित विकास की कुंजी होता है।
० बेरोज़गारी और पलायन के मुद्दों को समझा ही नहीं गया है। रोजगार के नाम पर सिड़कुल जैसी प्रक्रियायें फौरी तौर पर उद्योगों की आड़ में जमीनें हथियाना ही साबित हो रहा है। रोजगार की आस में युवा वर्ग हताशा और अवसाद में जी रहा है। मोटी कमाई कर रहे राज्य के शैक्षणिक संस्थान अभिभावकों के सांथ-सांथ इन संस्थानों में तैनात कार्मिकों का खुला आर्थिक शोषण कर रहे हैं। राज्य में शिक्षक की योग्यताधारी बेरोजगारों की संख्या एक लाख के आस पास है इतना तो तय है कि इन सबको सरकारी रोजगार नहीं दिया जा सकता परन्तु सरकार के हस्तक्षेप से क्यों न ऐसा हो कि ये संस्थान इन योग्यताधारियों को सम्मानजनक मेहनताने पर रोजगार मुहैया करायें।
० एक आदर्श स्थिति होगी कि यदि अधिकारिक रूप से अनिवार्य कर दिया जाये कि राज्य के राजनीतिज्ञ, नौकरशाह और राज्य कार्मिक अनिवार्य रूप से राज्य के स्वास्थ्य और शिक्षा का ही उपयोग करें तो राज्य प्रदत्त इन सुविधाओं की महत्ता भी साबित होगी और इन सबके प्रति खोया हुआ जनविश्वास फिर से लौट सकेगा।
   
राज्य की स्थिरता और दीर्घकालिकता के लिये मुद्दों और सुझावों की फेरहिस्त बहुत लंबी हो सकती है, परन्तु विपरीत पर्वतीय परिस्थितियों जैसे ही आपके राजनैतिक संघर्षों के आलोक में ऐसे बिन्दु गिनाने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। परन्तु मेरा लेखन धर्म मुझे रोक न सका और अति विश्वास व आशाओं के अतिरेक में यह सब लिख डाला है।

अन्यथा न लें आशा-विश्वास और सुझावों का यह क्रम अनवरत चलता रहेगा। वर्ष 1994 के उत्तराखंड आन्दोलन ज्वार में बागेश्वर के सत्ता विरोधी जनाक्रोश में आप द्वारा उद्बोधित पंक्तियां:- बादलों के दरमियां ये कैसी साजिश हुई। मेरा घर मिट्टी का था वहीं सबसे ज्यादा बारिश हुई।।

आपको ही नजर करते हुए विश्वास व्यक्त किया जा सकता है कि अब किसी भी साजिश और बारिश में भी सहजता कायम रह सकेगी। आपके सशक्त, निष्कलंक और यशस्वी सामाजिक-राजनैतिक जीवन की अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ,

सादर,
शुभाकांक्षी

  हरीश जोशी
स्वतंत्र पत्रकार,
निवास- ‘स्वातिधाम’ गरूड़
पत्रालय- बैजनाथ, जनपद बागेश्वर, 263641,उत्तराखंड
मोबा. 9411574220, 9675583051
ई मेल- joshiharish1969@gmail.com

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काली कमाई को सफेद बनाने में जुटा सहारा ग्रुप

[B]सहारा[/B] ग्रुप अपनी काली कमाई को सफेद करने के लिए नई चाल चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट का डंडा पड़ते ही सहारा यह बताने में जुट गया है कि 22 हजार करोड़ कहां से आए। सहारा ने गोल्डन यू स्कीम के जरिए एडवांस पैसा लेने के लिए एक फॉर्म निकाला है। फॉर्म को गौर से पढ़ने पर साफ हो जाता है कि यह कवायद संभावित सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखते हुए शुरू की गई है। फॉर्म के आवश्यक निर्देश में साफ लिखा है कि फॉर्म भरने वाले ‘कार्यकर्ता’ मई 2012 से पूर्व के जुड़े होने चाहिए। लेकिन आगे तो सहारा ने दुस्साहस दिखाते हुए कहा है कि फॉर्म में कोई तारीख न दी जाय।


[B]फार्म[/B] के दूसरे पेज पर देखें तो “विशेष’ निर्देश का बॉक्स बनाकर लिखा है कि जब कोई अधिकारी पूछे कि एडवांस में पैसा क्यों दिया है तो उसे बताना होगा कि वह संस्था से पहले से जुड़ा हुआ है। यह अधिकारी कौन होगा इसका फैसला तो सुप्रीम कोर्ट करेगा। लेकिन क्या कानूनी रूप से ऐसे दिशा निर्देशों के साथ फंड जुटाने की आजादी ठीक है। सहारा द्वारा जारी किए गए फॉर्म से साफ है कि सहारा की मंशा भीतर से काली है। वह नियमों की दुहाई देते हुए भी नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाता है। उसके बाद न्याय व्यवस्था को भी ठेंगे पर रखता है।

[B]सहारा [/B]ने दो महीना पहले मीडिया से सवा सौ लोगों को नौकरी से हटाया है। अब वो 56 हजार नौकरी देगा। ऐसा ही झूठा बयान उसने Q शॉप की लॉन्चिंग के वक्त भी दिया था। सहारा-सेबी विवाद के कारण निवेशक सहारा की योजनाओं में पैसा निवेश करने से बच रहे हैं जिससे कंपनी की माली हालत पर बुरा असर पड़ रहा है। इसको देखते हुए सहारा के नीति नियंता मीडिया में विज्ञापन जारी कर ये साबित करने में जुट गए हैं कि सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा है। लेकिन सच्चाई दुनिया जानती है। यह काले कारनामों से बचने के लिए गेम प्लान है।
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कोलकाता के कौन-कौन से मुद्दे नोट हो गये हैं नरेंद्र मोदी की डायरी में



























लाखों करोड़ों लोगों को अपने नमो-नमो के शंखनाद से प्रभावित करने वाले नरेंद्र मोदी के शंख कि गूंज आज कोलकाता में गूंजेगी। ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जन सैलाब उमड़ने लगा है। भारतीय जनता पार्टी के झंडे बैनर लग चुके हैं, मंच सज चुका है और नेताओं के भाषण शुरू हो चुके हैं। इंतजार है तो बस मोदी का। यूं तो मोदी की जनचेतना रैली अब तक जहां भी हुई है वहां उनके नाम का डंका सफलतापूर्वक बजा है। बांग्लावासियों पर मोदी का क्या जादू चलेगा, यह तो लोकसभा चुनाव की ईवीएम बतायेंगी, लेकिन बांग्लावासी उनसे क्या चाहते हैं, यह हम आपको बता सकते हैं। समस्यायों के श‍िकंजे में कसी जनता हमेशा इस उम्मीद में जीती है कि कभी तो कोई आकर उन्हें इन समस्याओं से निज़ात दिलाएगा ऐसे में मोदी जनता की इस उम्मीद का सहारा बनते नज़र आ रहे हैं। कहने को तो कोलकाता एक महानगर है, परंतु यह आज भी गरीबी, बेरोजगारी जैसे मूलभूत समस्याओं से ग्रस्त है। ऐसा नहीं है की ये समस्याएं देश के अन्य अन्य हिस्सों में नहीं हैं, पर एक महानगर होते हुए भी ये मुददे व्यापक स्तर पर यहां की जनता को प्रभावित कर रहें हैं। जनता क्या चाहती है, यह जानने के लिये हमने टटोली इंडिया272 डॉटकॉम । यह वो प्लेटफॉर्म है, जहां पर देश का कोई भी नागरिक अपनी समस्या नरेंद्र मोदी तक पहुंचा सकता है। या फिर अपनी बात कह सकता है। ज्यादातर कोलकाता वासियों ने बंगाल के शैक्ष‍िक स्तर, महिलाओं की सुरक्षा के स्तर, औधोगिक स्तर, संरचनात्मक के विकास के स्तर पर अपनी बात रखी और इन सभी में सुधार के सुझाव दिये। निसंदेह कोलकाता की सिथति अन्य महानगरों की अपेक्षा पिछड़ी हुई है सोचनीय है। जनता ने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि मोदी के विकास माडल से यहां नए उधोग पनपें, नई नीतियां लागु हों, बेरोजगारी खत्म हो जाये और राज्य आगे बढ़ सके। जनता चाहती है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय का नाम देश के सर्वश्रेश्ठ विश्वविद्यालयों में फिर से शुमार हो। कलकत्ता की जनता मोदी से सुरक्षा का भरोसा चाहती है, विकास का वादा चाहती है पर ऐसा वादा नहीं, जो ममता बनर्जी की तृणमुल काग्रेस ने किया। अब देखना यह है कि क्या मोदी अपनी इस रैली से बंगालवासियों को उनकी इन आशाओं के प्रति आश्वस्त कर पाएगें, क्या मोदी जनता के इन मुददों का समाधान कर पाने का भरोसा जीत पाएगें, क्या मोदी के शंख से जनता की आत्मवेदना की आह का स्वर प्रस्फूटित होगा, क्या सच में मोदी उस कोलकाता के नवनिर्माण का संकल्प लेगें जिसकी आशा वहां की जनता को है।

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